प्रस्तावना
मेरे दादा जी का नाम स्वर्गीय श्री माताप्रसाद धर द्विवेदी था।उनका जन्म उत्तर प्रदेश, बस्ती जिला के रानीपुर गाँव में १९१४ में हुआ था। संभवतः १८-१९ वर्ष की आयु में ही वो स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित हो गए। मेरे दादा जी गाँधी जी के अनुयायी थे।
गत वर्ष जब मैं पटना अपने घर गया, मैंने अपनी माँ से दादा जी की वह डायरी मांगी जो पिछले कई वर्षों से अलमारी के किसी कोने में रखी हुयी थी। मेरे दादाजी का स्वर्गवास हुए करीब २५ वर्ष बीत चुके थे। दादा जी के बाद मेरी दादी जी स्वर्गीय श्री मती पार्वती देवी का देहांत २००१ में मेरे माता-पिता के समीप हुआ | अपने अंतिम वर्षों में मेरी दादी जी अपने साथ एक लकड़ी की डलिया रखा करती थीं। मेरी दादी जी उस डलिया में मेरे दादा जी की कुछ स्मृतियाँ भी संजोये रखती थीं। उन स्मृतियों में मेरे दादा जी को भारत सरकार से स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के फलस्वरूप मिला हुआ तामपत्र भी था। और थी एक छोटी सी डायरी। लिखी हुयी तारीखों के अनुसार दादा जी ने वर्ष १९४२ में इस डायरी में लिखना प्रारम्भ किया।
यह डायरी बड़ी अनोखी है। इसमें मेरे दादा जी के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों का लेखा जोखा है। कई पारिवारिक प्रसंग हैं, तो कई प्रसंग स्वाधीनता संग्राम से जुड़े हुए हैं। पटना में इस डायरी को पढ़ने के बाद इस डायरी को अपनी एक अमूल्य धरोहर मान, मैं इसे अपने साथ स्वीडन ले आया। अपने दोस्तों और ऑफिस के सहकर्मियों से कई बार इसका उल्लेख भी किया है। इस डायरी को और इसके प्रसंगों को जीवित रखने के अच्छे संभव तरीकों को समझने की कोशिश की है | अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि मैं अपने दादा जी के सामाजिक और स्वाधीनता संग्राम से सम्बंधित प्रसंगों को कुछ भूमिका के साथ लिखने का प्रयत्न करूँगा।और जैसा मेरे दादा जी ने अपनी डायरी में कई बार लिखा है ... आगे प्रभो की इच्छा।
गत वर्ष जब मैं पटना अपने घर गया, मैंने अपनी माँ से दादा जी की वह डायरी मांगी जो पिछले कई वर्षों से अलमारी के किसी कोने में रखी हुयी थी। मेरे दादाजी का स्वर्गवास हुए करीब २५ वर्ष बीत चुके थे। दादा जी के बाद मेरी दादी जी स्वर्गीय श्री मती पार्वती देवी का देहांत २००१ में मेरे माता-पिता के समीप हुआ | अपने अंतिम वर्षों में मेरी दादी जी अपने साथ एक लकड़ी की डलिया रखा करती थीं। मेरी दादी जी उस डलिया में मेरे दादा जी की कुछ स्मृतियाँ भी संजोये रखती थीं। उन स्मृतियों में मेरे दादा जी को भारत सरकार से स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के फलस्वरूप मिला हुआ तामपत्र भी था। और थी एक छोटी सी डायरी। लिखी हुयी तारीखों के अनुसार दादा जी ने वर्ष १९४२ में इस डायरी में लिखना प्रारम्भ किया।
यह डायरी बड़ी अनोखी है। इसमें मेरे दादा जी के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों का लेखा जोखा है। कई पारिवारिक प्रसंग हैं, तो कई प्रसंग स्वाधीनता संग्राम से जुड़े हुए हैं। पटना में इस डायरी को पढ़ने के बाद इस डायरी को अपनी एक अमूल्य धरोहर मान, मैं इसे अपने साथ स्वीडन ले आया। अपने दोस्तों और ऑफिस के सहकर्मियों से कई बार इसका उल्लेख भी किया है। इस डायरी को और इसके प्रसंगों को जीवित रखने के अच्छे संभव तरीकों को समझने की कोशिश की है | अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि मैं अपने दादा जी के सामाजिक और स्वाधीनता संग्राम से सम्बंधित प्रसंगों को कुछ भूमिका के साथ लिखने का प्रयत्न करूँगा।और जैसा मेरे दादा जी ने अपनी डायरी में कई बार लिखा है ... आगे प्रभो की इच्छा।

It's great sir
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