जेल जीवन का पुरस्कार।
आज १५ अगस्त २०१८ को समग्र भारतवर्ष स्वाधीनता के ७२ वें वर्ष का उत्सव मना रहा है। यह अवसर मेरे दादाजी की डायरी के स्वाधीनता संग्राम के कुछ प्रसंगों का उल्लेख करने के लिए उपयुक्त प्रतीत होता है।
अपनी डायरी के दो पन्नों में दादा जी ने उनके गुजरे हुए लगभग सवा साल के स्वतंत्रता संग्राम का संक्षिप्त विवरण लिखा है। यह पन्ने २८ दिसंबर १९४३ को लिखे गए थे।
अनुमान लगाने पर यह जान पड़ता है कि उन्हें २१-२२ अगस्त १९४२ को बंदी बना लिया गया था। कुछ माह दरभंगा जिला की जेल में व्यतीत करने के पश्चात् उन्हें उनके कुछ साथियों सहित कैंप जेल पटना में स्थानांतरित कर दिया गया था। आजकल दरभंगा से पटना की यात्रा में औसतन तीन से चार घंटे लगते हैं। परन्तु दादा जी एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को स्थानांतरित करने में २४ घंटे से ऊपर लग गए थे।
दादा जी लिखते हैं कि, पटना जेल में प्रवेश करने पर उन्हें १०-१२ वर्षों से पहनते हुए उनके खादी के वस्त्रों का त्याग करना पड़ा। गौरतलब है कि उस समय मेरे दादा जी की आयु २८-२९ वर्ष रही होगी। तात्पर्य यह है कि लगभग १६ वर्ष की आयु में ही दादा जी ने खादी के वस्त्रों को धारण कर लिया था। मेरे दादा जी और दादी जी ने जीवन पर्यन्त केवल खादी के वस्त्रों का ही उपयोग किया।
२६ जनवरी १९४३ को पूर्ण-स्वराज की जयंती पर स्वतंत्रता सैनानियों ने पटना जेल में लाठियां खायीं। किसी कार्यक्रम या समारोह का कोई उल्लेख नहीं है, परन्तु अवश्य ही ऐसा कुछ हुआ होगा। बड़े उत्साह और जोश के साथ मेरे दादा जी लिखते हैं कि ७-८ लाठियों की चोट उनके लिए कुछ साधारण सी ही थी, और वे एक हफ्ते में फिर से चंगे हो गए। परन्तु कई सेनानियों को काफी चोट लगी। लगभग साढ़े चार हज़ार स्वतंत्रता सेनानी पटना की जेल में बंद थे। उन समस्त सेनानियों को हृदय से नमन।
अगले प्रसंग में दादा जी ने बड़ी ही सरलता से लिखा है कि उन्हें पुरस्कार में काल-कोठरी में बंद रहने की सजा मिली। यह पुरस्कार उन्हें हिन्दुस्तान सेवा दल की ट्रेनिंग प्राप्त करने के फलस्वरूप मिला था। चार दिन काल-कोठरी में बंद रहने और दो वक्त का भोजन न मिलने की सजा के पश्चात उन्हें काल-कोठरी के बाहर किया गया। वो भी हाथों और पैरों में बेड़ियाँ डाल कर। ऐसे प्रसंगों को पढ़ अनायास ही मुझे अपने जीवन के २८ वें वर्ष की परिस्तिथि स्मरण हो आती है। कितना अंतर रहा मेरी पीढ़ी के जीवन और मेरे दादा जी की पीढ़ी के जीवन में। जिस समय मेरे दादा जी जेल में थे, मेरी दादी दो बच्चों के साथ गाँव में रह रही थीं। वह दोनों बच्चे मेरे दो बड़े ताऊजी थे। जो उस समय क्रमशः लगभग ५ वर्ष एवं डेढ़ वर्ष की आयु के थे।
यह व्यंग्य नहीं बल्कि विचारों की सकारात्मकता ही है कि जेल में व्यतीत जीवन को दादा जी ने शांति और सानंद का जीवन कहा। समझ नहीं आता कि इसे सकारात्मक विचारों की पराकाष्ठा कहूं कि राष्ट्र को समर्पित जीवन का संतोष। दादा जी कहते हैं कि उन्हें १२ महीने १० दिन जेल में रहने का सौभाग्य मिला।
संभवतः जेल के जीवन की विषम परिस्तिथियों को उनके ही शब्दों में 'सुन्दर' बनाने में अच्छी पुस्तकों और अच्छे आचरण का बड़ा योगदान प्रतीत होता है। गीता, रामायण का पाठ, राजनैतिक एवं लगभग ३० अन्य पुस्तकों का अध्ययन उन्होंने जेल के इस काल में किया। व्यायाम एवं अन्य अध्ययन भी उनके जेल के जीवन का हिस्सा थे।
इन दो पृष्ठों को पढ़ने के पश्चात मैं शायद अपने दादा जी के जीवन को और जान पाया हूँ। मैंने दादा जी के रूप में २८-२९ वर्ष के नवयुवक को राष्ट्र को समर्पित अपने जीवन के कुछ समय को गर्व और उत्साह से एक डायरी में अंकित करता हुआ पाया।
आज इन पृष्ठों को लिखे हुए लगभग ७५ वर्ष हो चुके हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे दादा जी के संघर्ष के वह पल सार्थक हो रहे हैं।
जय हिंद!
अपनी डायरी के दो पन्नों में दादा जी ने उनके गुजरे हुए लगभग सवा साल के स्वतंत्रता संग्राम का संक्षिप्त विवरण लिखा है। यह पन्ने २८ दिसंबर १९४३ को लिखे गए थे।
अनुमान लगाने पर यह जान पड़ता है कि उन्हें २१-२२ अगस्त १९४२ को बंदी बना लिया गया था। कुछ माह दरभंगा जिला की जेल में व्यतीत करने के पश्चात् उन्हें उनके कुछ साथियों सहित कैंप जेल पटना में स्थानांतरित कर दिया गया था। आजकल दरभंगा से पटना की यात्रा में औसतन तीन से चार घंटे लगते हैं। परन्तु दादा जी एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को स्थानांतरित करने में २४ घंटे से ऊपर लग गए थे।
दादा जी लिखते हैं कि, पटना जेल में प्रवेश करने पर उन्हें १०-१२ वर्षों से पहनते हुए उनके खादी के वस्त्रों का त्याग करना पड़ा। गौरतलब है कि उस समय मेरे दादा जी की आयु २८-२९ वर्ष रही होगी। तात्पर्य यह है कि लगभग १६ वर्ष की आयु में ही दादा जी ने खादी के वस्त्रों को धारण कर लिया था। मेरे दादा जी और दादी जी ने जीवन पर्यन्त केवल खादी के वस्त्रों का ही उपयोग किया।
२६ जनवरी १९४३ को पूर्ण-स्वराज की जयंती पर स्वतंत्रता सैनानियों ने पटना जेल में लाठियां खायीं। किसी कार्यक्रम या समारोह का कोई उल्लेख नहीं है, परन्तु अवश्य ही ऐसा कुछ हुआ होगा। बड़े उत्साह और जोश के साथ मेरे दादा जी लिखते हैं कि ७-८ लाठियों की चोट उनके लिए कुछ साधारण सी ही थी, और वे एक हफ्ते में फिर से चंगे हो गए। परन्तु कई सेनानियों को काफी चोट लगी। लगभग साढ़े चार हज़ार स्वतंत्रता सेनानी पटना की जेल में बंद थे। उन समस्त सेनानियों को हृदय से नमन।
अगले प्रसंग में दादा जी ने बड़ी ही सरलता से लिखा है कि उन्हें पुरस्कार में काल-कोठरी में बंद रहने की सजा मिली। यह पुरस्कार उन्हें हिन्दुस्तान सेवा दल की ट्रेनिंग प्राप्त करने के फलस्वरूप मिला था। चार दिन काल-कोठरी में बंद रहने और दो वक्त का भोजन न मिलने की सजा के पश्चात उन्हें काल-कोठरी के बाहर किया गया। वो भी हाथों और पैरों में बेड़ियाँ डाल कर। ऐसे प्रसंगों को पढ़ अनायास ही मुझे अपने जीवन के २८ वें वर्ष की परिस्तिथि स्मरण हो आती है। कितना अंतर रहा मेरी पीढ़ी के जीवन और मेरे दादा जी की पीढ़ी के जीवन में। जिस समय मेरे दादा जी जेल में थे, मेरी दादी दो बच्चों के साथ गाँव में रह रही थीं। वह दोनों बच्चे मेरे दो बड़े ताऊजी थे। जो उस समय क्रमशः लगभग ५ वर्ष एवं डेढ़ वर्ष की आयु के थे।
यह व्यंग्य नहीं बल्कि विचारों की सकारात्मकता ही है कि जेल में व्यतीत जीवन को दादा जी ने शांति और सानंद का जीवन कहा। समझ नहीं आता कि इसे सकारात्मक विचारों की पराकाष्ठा कहूं कि राष्ट्र को समर्पित जीवन का संतोष। दादा जी कहते हैं कि उन्हें १२ महीने १० दिन जेल में रहने का सौभाग्य मिला।
संभवतः जेल के जीवन की विषम परिस्तिथियों को उनके ही शब्दों में 'सुन्दर' बनाने में अच्छी पुस्तकों और अच्छे आचरण का बड़ा योगदान प्रतीत होता है। गीता, रामायण का पाठ, राजनैतिक एवं लगभग ३० अन्य पुस्तकों का अध्ययन उन्होंने जेल के इस काल में किया। व्यायाम एवं अन्य अध्ययन भी उनके जेल के जीवन का हिस्सा थे।
इन दो पृष्ठों को पढ़ने के पश्चात मैं शायद अपने दादा जी के जीवन को और जान पाया हूँ। मैंने दादा जी के रूप में २८-२९ वर्ष के नवयुवक को राष्ट्र को समर्पित अपने जीवन के कुछ समय को गर्व और उत्साह से एक डायरी में अंकित करता हुआ पाया।
आज इन पृष्ठों को लिखे हुए लगभग ७५ वर्ष हो चुके हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे दादा जी के संघर्ष के वह पल सार्थक हो रहे हैं।
जय हिंद!


Comments
Post a Comment