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Showing posts from August, 2018

प्रस्तावना

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मेरे दादा जी का नाम स्वर्गीय श्री माताप्रसाद धर द्विवेदी था।उनका जन्म उत्तर प्रदेश, बस्ती जिला के रानीपुर गाँव में १९१४ में हुआ था। संभवतः १८-१९ वर्ष की आयु में ही वो स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित हो गए। मेरे दादा जी गाँधी जी के अनुयायी थे। गत वर्ष जब मैं पटना अपने घर गया, मैंने अपनी माँ से दादा जी की वह डायरी मांगी जो पिछले कई वर्षों से अलमारी के किसी कोने में रखी हुयी थी। मेरे दादाजी का स्वर्गवास हुए करीब २५ वर्ष बीत चुके थे। दादा जी के बाद मेरी दादी जी स्वर्गीय श्री मती पार्वती देवी का देहांत २००१ में मेरे माता-पिता के समीप हुआ | अपने अंतिम वर्षों में मेरी दादी जी अपने साथ एक लकड़ी की डलिया रखा करती थीं। मेरी दादी जी उस डलिया में मेरे दादा जी की कुछ स्मृतियाँ भी संजोये रखती थीं। उन स्मृतियों में मेरे दादा जी को भारत सरकार से स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के फलस्वरूप मिला हुआ तामपत्र भी था। और थी एक छोटी सी डायरी। लिखी हुयी तारीखों के अनुसार दादा जी ने वर्ष १९४२ में इस डायरी में लिखना प्रारम्भ किया। यह डायरी बड़ी अनोखी है। इस...

जेल जीवन का पुरस्कार।

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आज १५ अगस्त २०१८ को समग्र भारतवर्ष स्वाधीनता के ७२ वें वर्ष का उत्सव मना रहा है। यह अवसर मेरे दादाजी की डायरी के स्वाधीनता संग्राम के कुछ प्रसंगों का उल्लेख करने के लिए उपयुक्त प्रतीत होता है। अपनी डायरी के दो पन्नों में दादा जी ने उनके गुजरे हुए लगभग सवा साल के स्वतंत्रता संग्राम का संक्षिप्त विवरण लिखा है। यह पन्ने २८ दिसंबर १९४३ को लिखे गए थे। अनुमान लगाने पर यह जान पड़ता है कि उन्हें २१-२२ अगस्त १९४२ को बंदी बना लिया गया था। कुछ माह दरभंगा जिला की जेल में व्यतीत करने के पश्चात् उन्हें उनके कुछ साथियों सहित कैंप जेल पटना में स्थानांतरित कर दिया गया था। आजकल दरभंगा से पटना की यात्रा में औसतन तीन से चार घंटे लगते हैं। परन्तु दादा जी एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को स्थानांतरित करने में २४ घंटे से ऊपर लग गए थे। दादा जी लिखते हैं कि, पटना जेल में प्रवेश करने पर उन्हें १०-१२ वर्षों से पहनते हुए उनके खादी के वस्त्रों का त्याग करना पड़ा। गौरतलब है कि उस समय मेरे दादा जी की आयु २८-२९ वर्ष रही होगी। तात्पर्य यह है कि लगभग १६ वर्...